सरकार ने गठन किया आयोग का: अब कहा जा रहा कि यह आयोग नहीं समिति है
राजस्थान हाईकोर्ट ने पूर्ववर्ती सरकार के समय के कथित जमीन घोटालों की जांच के लिए गठित माथुर आयोग के कामकाज पर 4 नवम्बर को अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत में सरकार ने कहा कि माथुर आयोग, आयोग नहीं बल्कि जांच कमेटी है, जो सिर्फ प्रारम्भिक जांच कर रही है। मामले में सरकार ने विस्तृत जवाब के लिए दो सप्ताह का समय चाहा। अगली सुनवाई 20 नवम्बर को तय की गई है। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने मौखिक रूप से कहा कि राज्य सरकार यह स्पष्ट करे कि प्रारम्भिक जांच के आधार पर किसी राज्य सेवक को दोषी करार कैसे दिया जा सकता है? साथ ही, सरकार के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में गठित आयोग में आमजन की निष्ठा के कथन पर न्यायालय ने सवाल उठाया कि क्या सरकार का यह तर्क है कि राज्य सेवक इस प्रकार की निष्पक्ष जांच करने में सक्षम नहीं है।
न्यायालय ने यह भी कहा कि लोकायुक्त जैसी संस्था है, तो राज्य सरकार ने यह जांच लोकायुक्त को क्यों नहीं सौंपी? इस पर राज्य सरकार ने कहा कि लोकायुक्त जांच की एक विशिष्ट व निर्धारित प्रक्रिया है, इसलिए इस कमेटी का गठन किया। न्यायालय ने सरकार से कहा कि वह इस मामले में याचिका में उठाए गए सवालों का जवाब पेश करे। साथ ही, कहा कि न्यायालय ने दखल नहीं किया तो याचिका सारहीन हो जाएगी, इसलिए माथुर आयोग जनवरी 09 के राज्य सरकार के आदेश से मिले अधिकारों के तहत कोई कार्यवाही नहीं करे। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह अंतरिम आदेश मामले के गुणावगुण पर जाए बिना पारित किया जा रहा है।
राज्य सरकार ने 23 जनवरी 09 को आदेश जारी कर 2004 से 2008 के बीच भूमि सम्बन्धी व राज्य सरकार द्वारा सौंपे जाने वाले अन्य प्रकरणों की जांच व उन पर राज्य सरकार को सलाह के लिए पूर्व न्यायाधीश एन.एन. माथुर की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय आयोग का गठन किया था। आयोग को छह माह में अपनी रिपोर्ट देनी थी लेकिन इस दौरान फाइलों के एकत्रीकरण का काम भी पूरा नहीं हुआ और आयोग को इच्छित पूरा स्टाफ भी नहीं मिला। बाद में आयोग का कार्यकाल छह माह के लिए बढ़ाया गया लेकिन फिलहाल इसका काम पूरा होता नहीं दिखता। आयोग के अध्यक्ष न्यायाधीश माथुर कह चुके हैं कि इस महत्वपूर्ण जांच को समय सीमा में नहीं बांधा जा सकता।
वर्तमान सरकार ने सत्ता सम्भालने के बाद पिछली सरकार के समय के कथित जमीन घोटालों की तहकीकात के लिए तीन सदस्यीय जांच आयोग गठित किया था। आयोग के गठन को याचिका के जरिए चुनौती दी गई थी। मुख्य न्यायाधीश जगदीश भल्ला व न्यायाधीश मनीष भण्डारी की खण्डपीठ के समक्ष सुनवाई में प्रार्थी के अधिवक्ता अभिनव शर्मा ने बताया कि इस आयोग के गठन से पूर्व विधानसभा में बहस होनी चाहिए थी। विधानसभा में दो तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित हुए बिना सरकार पूर्ववर्ती मंत्रिमण्डल के समय के कार्यो की जांच के लिए तथ्यान्वेषण कमेटी का गठन नहीं कर सकती, क्योंकि मंत्रिमण्डल के निर्णय राज्यपाल के स्वयं के निर्णय होते हैं। ऎसे में राज्यपाल द्वारा जनवरी 09 के आदेश से आयोग का गठन असंवैधानिक है। इसका गठन, आयोग गठन सम्बन्धी अधिनियम के तहत नहीं है। कमेटी कार्यक्षेत्र से बाहर जाकर जांच के लिए उच्चाधिकारियों को समन से तलब कर साक्ष्य के लिए बुला रही है और सार्वजनिक विज्ञप्ति जारी कर आमजन से शिकायत व सूचना मांग रही है।
महाधिवक्ता जी.एस.बापना व अतिरिक्त महाधिवक्ता एन.ए. नकवी ने कहा कि यह आयोग नहीं, बल्कि कमेटी है। इसे शिकायतों व आरोपों की सच्चाई जानने के लिए प्रारम्भिक जांच करने को कहा गया है। राज्य सरकार दोषी व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए यह प्रारम्भिक जांच करा रही है। सरकारी पक्ष ने आयोग के कार्यकलाप के बारे में पूरी जानकारी के लिए समय चाहा है।
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