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अस्थायी कर्मचारी मुआवजे का हकदार नहीं: हाई कोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि अस्थायी कर्मचारी मूल मालिक से मुआवजे पाने का दावा नहीं कर सकता है। वह भी तब जब कर्मचारी ठेकेदार के कहने पर उसके पर्यवेक्षण में काम कर रहा हो और दुर्घटनाग्रस्त हो जाए। न्यायाधीश वी बी गुप्ता ने कहा कि ऐसे लोग जो ठेकेदार के जरिए किसी प्रतिष्ठान या व्यवसाय में काम कर रहे हैं, वे चोट लगने की स्थिति में उक्त प्रतिष्ठान से मुआवजा पाने के हकदार नहीं हैं। अदालत ने यह आदेश मेसर्स भसीन पेट्रोल पंप द्वारा मुआवजा आयुक्त के फैसले को चुनौती देने वाली दायर याचिका पर दिया। आयुक्त ने कामगार मुआवजा अधिनियम के तहत मुहम्मद शोइबुद्दीन खान को कर्मचारी मानते हुए क्षतिपूर्ति संबंधी यह आदेश दिया था। इस मामले में खान, मेसर्स विकास इलेक्ट्रानिक्स में बतौर इलेक्ट्रीशियन कार्यरत था। उसने भसीन पेट्रोल पंप में बिजली की मरम्मत का ठेका लिया था। पेट्रोल पंप पर काम के दौरान हादसे में खान जख्मी हो गया और कुछ दिनों बाद 1995 में उसकी मौत हो गई। क्षतिपूर्ति आयुक्त ने पेट्रोल पंप मालिक को निर्देश दिया था कि वह मरने वाले की मां को 1.95 लाख रुपये बतौर मुआवजा दे। इसके बाद पेट्रोल पंप मालिक ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अदालत ने कमिश्नर के आदेश को पलटते हुए कहा कि एक्ट के मुताबिक मरने वाला कर्मचारी की श्रेणी में नहीं आता है।
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मरने वाला बिजली कंपनी का कर्मचारी था। इस लिए यह सही है कि प्रिंसिपल उस का कर्मचारी नहीं था। मुआवजा देने का दायित्व भी उसी ठेकेदार का था। हाँ, अदालत यह र सकती थी कि वह यह मुआवजा राशि पेट्रोल पंप को चुकाने का आदेश दे सकती थी इस शर्त के साथ कि पेट्रोल पंप को यह धन बिजली कंपनी से वसूल पाने का अधिकार होगा। लेकिन सीधे पेट्रोल पंप का दायित्व ठहराना गलत है।