सजा के लिए बलात्कार पीड़िता की गवाही ही काफी है: सुप्रीम कोर्ट
देश में दुष्कर्म के बढ़ रहे मामलों को देखते हुए सुप्रीमकोर्ट ने व्यवस्था दी है कि अगर पीडि़त की गवाही विश्वास योग्य है तो मेडिकल साक्ष्यों के अभाव में भी यह अभियुक्त को सजा दिलाने के लिए काफी है। एक फैसले में न्यायमूर्ति अरिजित पसायत और न्यायमूर्ति पी सदाशिवम की पीठ ने कहा कि किसी मामले में पीडि़ता की जांच करने वाला डाक्टर अगर दुष्कर्म का कोई सबूत नहीं पाता है तब भी बलात्कार पीड़िता की गवाही पर विश्वास किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार पीडि़ता की गवाही अदालत के लिए काफी है। अदालत ने इसका कारण बताया कि सामान्य स्थिति में दुष्कर्म की शिकार इस तरह के अपराध को बताना नहीं चाहती है यहां तक कि वह अपने परिवार से भी इसे छुपाना चाहती है। बहुत कम स्थिति में वह लोगों और पुलिस के सामने यह बात बताती है। पीठ ने कहा कि भारतीय महिलाओं में इस तरह के अपराध को छुपाने की प्रवृत्ति होती है क्योंकि यह उनके एवं उनके परिवार की प्रतिष्ठा से जुड़ी होती है। कुछ मामलों में ही पीड़िता और उसके परिवार के लोग थाने में जाकर प्राथमिकी दर्ज कराने का साहस दिखाते हैं। अदालत के अनुसार अगर रिकार्ड में बताई गई परिस्थितियां यह उजागर करती हैं कि पीड़िता गलत तरीके से आरोपी को नहीं फंसाना चाहती तो सामान्य तौर पर अदालत को उसके साक्ष्य को स्वीकार करने में कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। मोतीलाल गादरिया की याचिका को खारिज करते हुए पीठ ने कहा कि अभियुक्त घिसेपिटे फार्मूले से चिपका नहीं रह सकता और पुष्टि करने वाले साक्ष्यों के लिए जोर नहीं दे सकता।
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के भुसौर गांव में पीड़ित गृहिणी के साथ मोतीलाल गादरिया ने 17 जनवरी 2002 को तब दुष्कर्म किया था जब उसका पति घर से बाहर गया हुआ था। सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि दुष्कर्म सिर्फ शारीरिक उत्पीड़न ही नहीं है बल्कि यह पीड़िता के पूरे व्यक्तित्व को बर्बाद कर देता है। न्यायमूर्ति पसायत ने फैसला लिखते समय कहा कि हत्यारा किसी के शरीर का अंत करता है लेकिन एक दुष्कर्मी असहाय महिला की आत्मा की हत्या कर देता है। अदालत को ऐसे मामलों को काफी संवेदनशीलता से लेना चाहिए।

इंटरनेट की दुनिया पर अदालत की लोकप्रियता के बारे में बहुत कुछ लिखने की इच्छा थी, किन्तु पोस्ट बड़ी हो जाने का भय है। फिर कभी सही। बस एक बात कहीं कचोटती है कि 




1 ने गवाही दी:
ये फैसला निसंदेह बहुत ही अच्छा है ...बलात्कारियों को तो फंसी की सजा से कम कुछ नहीं होना चाहिए ..लेकिन ये तय करना के शिकायतकर्ता कितना सच कर रहा है ये मुश्किल है ?
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