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आपसे कुछ कहना है

इकलौते व्यक्ति द्वारा 'लिखे' जा रहे 'अदालत' ब्लॉग ने 2000 पोस्ट का आंकडा छू लिया है। यह 2000 पोस्ट्स भी मात्र 31 महीनों के भीतर पूरी हुईं हैं। वस्तुत: इसे लेखन न कह कर संकलन कहना ज़्यादा उचित होगा। फिर भी विभिन्न संचार माध्यमों से एक ख़ास विषय की सूचनायों को एकत्र करना, विभिन्न भाषायों के शब्दों को हिन्दी में अनुवाद कर सामने लाना, ज़रूरी लिंक लगाना, विषय अनुरूप चित्र संलग्न करना, संपादित करना, समय पर प्रकाशित करना सामाजिक-पारिवारिक-आजीविका के दायित्वों के बीच काफी दुरूह कार्य है। वह भी एक ही व्यक्ति द्वारा। लेकिन यह सम्भव हो पाया है एक जुनून के कारण।

peace अहिन्दी भाषी माने जाने के बावजूद, मैंने कभी यह दावा नहीं किया कि मैं हिन्दी की सेवा कर रहा हूँ, प्रचार-प्रसार में लगा हूँ या हिन्दी को नयी ऊँचाइयों पर ले जाने का इरादा है। ऐसे कैसे कह सकता हूँ, जब कि मैं तो रोजाना नई-नई चीजें सीखता हूँ। बस, हिन्दी मुझे अच्छी लगती है और जो चीज मुझे अच्छी लगती है उसे जतनपूर्वक संभाले रखना अपनी जिम्मेदारी समझता हूँ। इतनी बार 'मैं' का उल्लेख जानबूझ कर किया गया है, क्योंकि हाल ही में कथित हिन्दी प्रेमियों के अपशब्दों को झेला है, मैंने।

इस बार कुछ अधिक नहीं लिखूंगा। फिर भी अदालत ब्लॉग का इतिहास देखा जाए तो पिछले वर्ष 2008 की दीपावली के अवसर पर 1000 मुकद्दमों का जश्न मनाया था और उससे 4 महीने पहले ही तो 500 पोस्ट की खुशी जाहिर की थी। अदालत की प्रथम पोस्ट, प्रथम टिप्पणी, ब्लॉग जगत में प्रथम उल्लेख और 500 वीं पोस्ट की खुशी, पहली वर्षगाँठ , एक वर्ष में 1200 पोस्ट की बातें, याद की जानी चाहिये।

tepuktangan इस अंतराल में आप सभी की सराहना, टिप्पणियाँ, शाबाशी, मार्गदर्शन, मांग, आलोचना और धमकी ने मेरे लिए उत्प्रेरक का कार्य किया है। जिसके चलते कुछ और बेहतर करने की ऊर्जा बनी रहती है। इसके अलावा मैं, उन तमाम ब्लॉगर्स/ चिट्ठाकारों/ एग्रीगेटर्स/ वेबसाईट्स को धन्यवाद देता हूँ, जिन्होंने 'अदालत' का उल्लेख किया या लिंक लगायी या पसंद किया। समस्त टिप्पणीकर्तायों को, संजीवनी रूपी टिप्पणियों के लिए तो धन्यवाद शब्द नाकाफी होगा। किसी भी कार्य के मूल ऊर्जा स्त्रोत/ जनक को भूलना नादानी मानी जायेगी। विभिन्न व्यक्तियों, संस्थायों, समाचार-पत्रों, वेबसाईट्स का आभारी हूँ, जिनकी मूल खबरों/ जानकारियों की बदौलत यह ब्लॉग इस पड़ाव पर पहुँच सका है।

adacall कई ब्लॉगर साथियों ने मुझसे शिकायत की है कि आपका फोन नम्बर, चित्र, सम्पर्क सूत्र नहीं है कहीं, मुलाकात कैसे की जाये या पहचाना कैसे जाये? उनसे जो कुछ कहा, वही दोहराता हूँ कि अपने स्वभाव के कारण मुझे अपनी प्रशंसा से बहुत संकोच है और आत्मप्रचार भी अटपटा लगता है। कुछ चुनिंदा महिला-पुरूष ब्लॉगर, जिन्हें मैं अपने निकट महसूस करता हूँ, उन्हें मैंने स्वयं परिचय दिया है और तकरीबन सभी से मेरा दैनिक संवाद है।

मुझे लगता है कि इस पोस्ट पर आत्मप्रचार काफी हो चुका। kenyit

ब्लॉगजगत के साथियों का कुछ उल्लेख तो आप मेरी इस पोस्ट पर भी देख सकते हैं।
:inis:इंटरनेट की दुनिया पर अदालत की लोकप्रियता के बारे में बहुत कुछ लिखने की इच्छा थी, किन्तु पोस्ट बड़ी हो जाने का भय है। फिर कभी सही। बस एक बात कहीं कचोटती है कि दैनंदिन कार्यों से जुड़े अदालत के फैसलों पर गैर-विधिक क्षेत्र के ब्लॉगर साथियों की टिप्पणियाँ लगभग हैं ही नहीं। इसका प्रमाण है इन 2000 विधिक जानकारियों पर मात्र 1243 टिप्पणियाँ! इससे क्या अर्थ निकलता है आप जानें gatai

ब्लॉग जगत में आप सभी का स्नेह मिला, स्वस्थ आलोचना मिली, उत्साहवर्धन मिला। जिसके चलते आज यह अदालत के 2000 पोस्ट है। आप सभी आगुन्तकों, टिप्पणीकर्तायों का धन्यवाद। अंत में यही कहना चाहता हूँ कि अब कुछ विराम दिया जा रहा है इस अदालत ब्लॉग को। यह विराम, एक अर्ध विराम ही है लगभग एक माह का। इस अंतराल में अपनी ऊर्जा को ब्लॉग जगत में ही लगाया जायेगा किसी और विषय विशेष पर। तब तक दीजिये इजाजत। babai

-लोकेश
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Friday, 18 July, 2008

पुलिस अफसर वर्दी वाले डॉन हैं !? अरे भई, हाई कोर्ट कहता है

पहले अदालतों ने पुलिस को 'संगठित अपराधियों का समूह' और 'वर्दी वाले गुंडे' कह कर पुकारा था। वेद प्रकाश कम्बोज का भी एक उपन्यास इसी नाम से हिट हुया था। अब केरल हाईकोर्ट ने पुलिस तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार और भेदभाव पर तल्ख टिप्पणी की है। अदालत ने सत्ता से करीबी रखने वाले अफसरों को वर्दी वाला डॉन करार दिया है। अदालत ने कहा है कि रसूख वाले अफसर अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि के बावजूद सारी मलाई मार ले जाते हैं।

न्यायमूर्ति वी. रामकुमार ने कहा कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले जवानों-अधिकारियों की सर्विस बुक में अच्छी एंट्री दर्ज हो जाती है, उन्हें तरक्की भी मिल जाती है और वे पुलिस पदक के लिए सिफारिश भी पा लेते हैं। उन्होंने कहा कि रसूख वाले अधिकारी अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि के बावजूद प्रभाव के बल पर ऐसे फायदे ले लेते हैं। उन्होंने ईमानदार और कर्मठ अधिकारियों के बारे में कहा कि वे रसूख नहीं होने के चलते आसानी से शिकार बन जाते हैं और तमाम फायदों से वंचित रहते हैं। न्यायाधीश कुमार ने रसूखदार, आपराधिक छवि वाले पुलिसकर्मियों को वास्तवि डॉन करार दिया।

जज ने यह टिप्पणी सरकार की ओर से दायर एक आपराधिक पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए की। इस मामले में राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) और एक उपाधीक्षक (DSP) आरोपी हैं। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में सरकार के रुख से ऐसा लगता है कि वह डीएसपी को IPS कैडर में प्रोन्नत होते नहीं देखना चाहती, जबकि उन्हें प्रोन्नति मिलने के पूरे आसार हैं। अदालत ने पूछा कि यह गंदा खेल कौन खेल रहा है? क्या सरकार इस खेल से वाकिफ है या फिर उसके बड़े अधिकारियों की मिलीभगत से यह सब हो रहा है?

अदालत को बताया गया कि पुनर्विचार याचिका एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के निर्देश पर दायर की गई है। इससे पहले अदालत ने मामले की सुनवाई तय समय सीमा के भीतर करने के लिए कहा था। लेकिन सरकार ने इसकी अनदेखी करते हुए पुनर्विचार याचिका दाखिल कर दी। इसी आधार पर अदालत ने यह याचिका खारिज कर दी।

4 ने गवाही दी:

Rajesh Roshan 18 July, 2008 2:06 PM  

कोर्ट की बात मान्य होती है और आम लोगो की नही.... लेकिन सत्य कोई कोर्ट नही जानता.... है तो है इसमे कोई जिरह नही....

Gyandutt Pandey 18 July, 2008 3:37 PM  

वाह यह तो वही हो गया कि पुलीस सबसे व्यवस्थित माफिया है! :)

दिनेशराय द्विवेदी 18 July, 2008 7:33 PM  

अदालतें सब जानती हैं। उन्हें कहने का अवसर मिलता है तब कहती भी हैं। जज सार्वजनिक रूप से नहीं बोलते। इस लिए ऐसा लगता है। उन का सार्वजनिक रूप से बोलना उचित भी नहीं है।

Anonymous,  16 November, 2008 2:08 PM  

जिस उपन्यास का आपने जिक्र किया है, वो वेदप्रकाश शर्मा का था, वेदप्रकाश काम्बोज नहीं।

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