अदालतों में लंबित तीन करोड़ मामले निपटाने के लिए आधुनिक तकनीक पर जोर
देश की विभिन्न अदालतों में करीब तीन करोड़ मुकदमे लंबित हैं, लेकिन यदि अदालतों को पूरी तरह Information and Communication Technology (आईसीटी) से लैस कर दिया जाए तो लंबित मुकदमों की जल्दी से जल्दी निपटाया जा सकता है। सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीश पी सदाविम के अनुसार देश की निचली अदालतों में 30 सितंबर 2007 तक लंबित मुकदमों की कुल संख्या ढाई करोड़ थी, जबकि विभिन्न उच्च न्यायालयों में यह आंकड़ा 37 लाख 12 हजार था। उन्होंने बताया कि सुप्रीमकोर्ट में लंबित मुकदमों की संख्या 44 हजार 819 थी।
न्यायमूर्ति सदाविम ने कृष्ण मेनन मेमोरियल सोसाइटी की ओर से शनिवार, १० मई को न्यायिक प्रणाली का विकास विषय पर आयोजित व्याख्यान माला में कहा कि आईसीटी के इस्तेमाल से अन्य अदालती कार्यवाहियों में जाया होने वाला समय बचाया जा सकता है और मुकदमों के निपटारे पर अधिक से अधिक समय दिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि भारतीय न्यायिक प्रक्रिया के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है मुकदमों की सुनवाई में विभिन्न कारणों से होने वाली देरी और इसकी वजह से लंबित मुकदमों के लगते अंबार। अदालती कामकाज के प्रबंधन में आईटीसी के इस्तेमाल से सुधार की व्यापक गुंजाइश है।
न्यायमूर्ति सदाविम ने कहा कि नागरिकों के अधिकारों के प्रति गैर जिम्मेदाराना रवैये, दायित्व से मुंह मोड़ने तथा गलत फैसलों की वजह से भी अदालतों में मुकदमों की संख्या बढ़ रही है। इन मुकदमों में सरकारी मामले अधिक हैं। उन्होंने बताया कि देश की अदालतों में लंबित मुकदमों से ज्यादातर भारत सरकार, राज्य सरकारों और क्षेत्र के उपक्रमों सरकारी निगमों और निकायों से जुडे़ हैं। उन्होंने सलाह दी कि सभी सरकारों को उन मुकदमों की जिनमें वे पक्षकार हैं निपटारे के लिए इन हाउस प्रणाली विकसित करनी चाहिए और उसके तहत यह तय करना चाहिए कौन-से मुकदमे लडे़ जाने चाहिए और कौन से नहीं। उन्होंने इसके लिए पूर्व न्यायाधीशों या न्यायिक सलाहकारों की उच्चस्तरीय समिति गठित करने की भी सलाह दी जो यह तय करने में सक्षम हो कि किन मुकदमे को अदालती कार्यवाही से उठाने दिया जाए और किन को छोड़ दिया जाए। उन्होंने सरकारी वकीलों की कमी को भी लंबित मुकदमों की संख्या में वृद्धि के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि ज्यादातर मामलों में ऐसी नियुक्तियां योग्यता के आधार पर होने की बजाए अन्य चीजों को ध्यान में रखकर की जाती हैं।
हालांकि इस मसले को श्री दिनेश राय द्विवेदी, तथ्यों और तर्कों के साथ समय समय पर अपने ब्लॉग तीसरा खम्भा पर उठाते रहते हैं। इस अदालत ब्लॉग पर भी मुख्य न्यायाधीश के सुझाव, न्यायाधीशों के सम्मेलन या त्वरित न्यायालयों के गठन की खबरों के साथ श्री द्विवेदी जी के विचारों का समर्थन किया जाता है, किंतु लगता है अभी सफर काफी लंबा है।

इंटरनेट की दुनिया पर अदालत की लोकप्रियता के बारे में बहुत कुछ लिखने की इच्छा थी, किन्तु पोस्ट बड़ी हो जाने का भय है। फिर कभी सही। बस एक बात कहीं कचोटती है कि 




1 ने गवाही दी:
तकनीक के प्रयोग से मुकदमों के निपटारे की गति को मामूली रुप से बढ़ाया जा सकता है। लेकिन जो समस्या का पूरा समाधान नहीं खोजा जा सकता है। वास्तविकता यह है कि हमारी न्याय पालिका का आकार हमारी जरूरत का एक चौथाई भी नहीं है। वह आज भी अपनी क्षमता से बहुत अधिक काम कर रही है। इस से न्यायिक अधिकारियों पर काम का बोझ बढ़ा है। वे थकान से परेशान हैं। जिला और उस से नीचे के स्तर की अदालतों में एक समय में एक जज तीन तीन काम एक साथ कर रहा है। एक ओर वह दो-दो मुकदमों में साक्ष्य ले रहा है, दूसरी और वकीलों की बहस सुन रहा है। नतीजा यह है कि वह केवल प्रबंधन कर रहा है। साक्ष्य केवल क्लर्क ले रहे हैं और बहस सुनी ही नहीं जा रही है। हो यह रहा है कि काम व निर्णयों की गुणवत्ता का स्तर तेजी से नीचे गिरा है। इस का केवल एक ही हल है कि हमें न्यायपालिका का आकार बढ़ाना ही होगा। बाकी उपायों से केवल गुणवत्ता को सुधारा जा सकता है।
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