आइए मुकद्दमे तलाशें

  • सुप्रीम कोर्ट ने जजों के स्थानांतरण, नियुक्ति के बारे में जानकारी दिए जाने के मुद्दे पर नजरिया पूछा अदालतों को लेकर सूचना के अधिकार की बहस भारत के मुख्य न्यायाधीश के दफ्तर से आगे बढ़ कर देश भर के हाईकोर्टो तक पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट ने जजों के स्थानांतरण और नियुक्ति के बारे में सूचना कानून के तहत जानकारी दिए जाने के मुद्दे पर देश भर के हाईकोर्टो को नोटिस जारी कर उनका नजरिया पूछा है। ये नोटिस सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक पीठ के न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी व न्यायमूर्ति एसएस निज्जर की पीठ ने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के फैसले के खिलाफ दाखिल सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री की याचिका पर सुनवाई के बाद जारी किए। सीआईसी ने सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री को जजों की नियुक्ति का ब्यौरा देने का निर्देश दिया था।

    एक अन्य मामले में केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने उस पत्राचार का खुलासा करने का भी निर्देश दिया था जो मद्रास हाईकोर्ट के न्यायाधीश आर. रघुपति व भारत के मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन के बीच हुआ था। यह पत्राचार एक लंबित मामले में केंद्रीय मंत्री के दखल से संबंधित था। सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने उस फैसले को भी सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक पीठ में चुनौती दे रखी है। फिलहाल दोनों आदेशों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक लगी है।

    याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री की पैरवी कर रहे अटार्नी जनरल जीई वाहनवती ने कहा कि याचिकाओं में महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दा शामिल है जिसे सुप्रीम कोर्ट को तय करना होगा। उन्होंने कहा कि जजों की नियुक्ति और स्थानांतरण से संबंधित जानकारी का खुलासा सूचना कानून के तहत नहीं किया जा सकता। ऐसा करने से इस प्रक्रिया (नियुक्ति) में हिस्सा लेने वाले न्यायाधीश खुल कर अपनी राय नहीं प्रकट करेंगे। उनकी दलीलों पर पीठ ने कहा कि इस मुद्दे पर सभी उच्च न्यायालयों की भी राय ली जानी चाहिए क्योंकि उनके पास भी आए दिन ऐसी अर्जियां आती हैं। इसके साथ ही पीठ ने सभी उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल को नोटिस जारी कर अपने नजरिए से अवगत कराने को कहा है।

    दूसरी ओर, सूचना कानून के तहत जानकारी मांगने वाले अर्जीकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट को पहले हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करनी चाहिए थी, जबकि उसने सीधे सुप्रीम कोर्ट में ही फैसले को चुनौती दे दी है। भूषण ने कहा कि इससे जनता में ठीक संदेश नहीं जाता है, क्योंकि एक तरफ तो सुप्रीम कोर्ट पारदर्शिता की बात कहता है और दूसरी ओर जब मामला उस पर आता है तो पीछे हट जाता है।

    भूषण ने कहा कि बाकी मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट अन्य मामले की सुनवाई में विचार करेगा। केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) अपने कई फैसलों में कह चुका है कि मुख्य न्यायाधीश का दफ्तर सूचना कानून के दायरे में आता है और मुख्य न्यायाधीश के पास की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।

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  • सांसद के खिलाफ कल गैर जमानती वारंट जारी हुया, आज वे अदालत के समारोह में मुख्य अतिथि थे! शायद यह खबर चौंकाने वाली न हो। आप माने या ना माने लेकिन यह सच है कि जिस सांसद के खिलाफ मजिस्ट्रेट के साथ मारपीट करने पर कल गैर जमानती वारंट जारी किया गया और आज, वे अदालत के एक समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुये!

    मामला यह है कि मऊ अपर जिला सत्र न्यायाधीश प्रवीण कुमार ने, कोतवाली इलाके में लोक निर्माण विभाग के डाक बंगले में नगर मजिस्ट्रेट संतोष कुमार के साथ मारपीट करने के मामले में, उत्तर प्रदेश की घोसी सीट से बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के सांसद दारा सिंह चौहान और रसडा से विधायक घूरा राम समेत चार लोगों के खिलाफ 8 फरवरी को गैर जमानती वारंट जारी किया था।

    नगर मजिस्ट्रेट ने 1998 में दारा सिंह चौहान.घूरा राम और अन्य दस लोगों के खिलाफ मारपीट तथा छीनाझपटी की रिपोर्ट दर्ज करायी थी।

    मुकदमें की सुनवाई में लगातार अनुपस्थित रहने के कारण श्री चौहान, घूरा राम और दो अन्य के खिलाफ कल गैर जमानती वारंट जारी किया गया। सुनवाई के दौरान कल सिर्फ एक अभियुक्त अदालत में हाजिर हुआ था। अदालत ने मामले की सुनवाई के लिये आगामी 26 फरवरी की तारीख तय की है।

    दीवानी न्यायालय के स्थापना दिवस पर 9 फरवरी को मऊ में हुये कार्यक्रम में श्री चौहान मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुये।

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  • अंबेडकर पार्क निर्माण पर रोक बरकरार रहेगी सुप्रीम कोर्ट ने अंबेडकर पार्क मामले पर सुनवाई करते हुए 9 फरवरी को इसके निर्माण पर रोक बरकरार रखने का फैसला सुनाया। हालांकि, कोर्ट ने पार्को में देख-रेख के काम की अनुमति दे दी है। इसके साथ ही अदालत ने नोएडा पार्क मामले की सुनवाई को छोड़कर बाकी सभी मामले वापस इलाहाबाद हाई कोर्ट भेज दिए। नोएडा मामले की सुनवाई अगले महीने 12 मार्च को होगी। अदालत ने उत्तर प्रदेश की सरकार को अंबेडकर पार्को में निर्माण कार्य पर लगी रोक को बरकरार रखते हुए छिटपुट काम निपटाने की इजाजत दी है।

    उल्लेखनीय है कि इस मामले से संबंधित 12 याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लंबित थी जिसे कोर्ट ने इलाहाबाइ हाई कोर्ट में भेज दिया। हाई कोर्ट से चार महीनों के अंदर सारे मामले निपटाने को कहा गया है। अब सिर्फ नोएडा पार्क मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में जारी रहेगी।

    सर्वोच्च अदालत ने मुख्य सचिव को अदालत की अवमानना से भी बरी कर दिया है। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने बीते साल अक्टूबर में उत्तर प्रदेश के नोएडा और लखनऊ में बने रहे कांशीराम पार्क और अंबेडकर पार्को में निर्माण कार्य पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस संदर्भ में सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी और अवमानना का नोटिस भी जारी किया था।

    अंबेडकर पार्को के मामले में अदालत ने स्पष्ट किया था कि सरकार, जनता के पैसों का दुरूपयोग कर रही है और अदालत चाहे राज्य सरकारों के फैसलों में दखल दे सकती है।

    गौरतलब है कि नोएडा में करोड़ों रूपए की लागत से 75 एकड़ में उत्तर प्रदेश सरकार एक पार्क का निर्माण कर रही है। नोएडा पार्क को मुख्यमंत्री "ड्रीम प्रोजेक्ट" माना गया है। पार्क बनाने के लिए इलाके में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की गई थी। जिसके बाद इस पार्क को लेकर पर्यावरण मंत्रालय ने आपत्ति जताई थी। पार्क बनाने के लिए जनता के पैसों की फिजूलखर्जी को लेकर सरकार, कई राजनीतिक दलों के निशाने पर है।

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  • राजस्थान की विभिन्न अदालतों में कार्यरत 60 से ज्यादा वकीलों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की तलवार राजस्थान हाईकोर्ट सहित प्रदेश की विभिन्न अदालतों में कार्यरत 60 से ज्यादा वकीलों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की तलवार लटक रही है। इन अधिवक्ताओं के आचरण के संबंध में उनके साथी अधिवक्ताओं ने राजस्थान बार काउंसिल में शिकायतें दर्ज करा रखी हैं। काउंसिल की अनुशासन समिति की 13 फरवरी को होने वाली बैठक में पिछले छह महीने से लंबित शिकायतों पर विचार विमर्श किया जाएगा। शिकायत सही पाए जाने पर आरोपी वकीलों का पंजीकरण निलंबित भी किया जा सकता है।

    बार काउंसिल के सचिव के अनुसार 13 फरवरी को काउंसिल की साधारण सभा की बैठक के साथ ही अनुशासन समिति की बैठक भी होगी। इस दौरान समिति के सामने आई शिकायतों की जांच की जाएगी। जिन लोगों के खिलाफ शिकायतें आई हैं उन्हें नोटिस जारी कर जवाब तलब किया जाएगा। यदि आरोपी वकीलों के जवाब संतोषजनक नहीं पाए गए तो उनके विरुद्ध जांच समिति बिठाई जाएगी। यह समिति मामले की गंभीरता की जांच कर आरोपी वकील के विरुद्ध उचित कार्रवाई की सिफारिश करेंगी।

    बार काउंसिल के सचिव ने बताया कि बार काउंसिल में 10 अनुशासनात्मक समितियों का गठन किया हुआ है। बार काउंसिल चुनावों के मद्देनजर इन समितियों की बैठक पिछले छह माह से नहीं हो पाई, अन्यथा नियमित रूप से त्रैमासिक अथवा आवश्यकतानुसार कभी भी बैठक आहूत की जा सकती है।

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  • हाई कोर्ट ने आन्ध्र प्रदेश में मुस्लिमों को दिया जा रहा चार प्रतिशत आरक्षण रद्द किया आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने ८ फरवरी को शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी संस्थाओं में मुस्लिमों को दिया जा रहा चार प्रतिशत आरक्षण रद्द कर दिया है। अदालत की सात सदस्यीय बेंच ने बहुमत के आधार पर मुस्लिम कोटा बिल निरस्त किया। सात जजों की विशेष बेंच में पांच जज आरक्षण को रद्द करने के पक्ष में थे। माना जा रहा है कि हाई कोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी। उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने मुस्मिल अल्पसंख्यकों की 15 बिरादरियों को सरकार नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में चार प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया था जिसे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

    हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि वर्ष 2007 में इस बिल के तहत की गई छात्रों की भर्ती को अवैध नहीं ठहराया जाएगा।

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  • दहेज हत्या से जुड़े विरले मामलों में ही दोषी को उम्रकैद की सजा सुनाई जानी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च अदालत ने दहेज हत्या से जुड़े एक मामले का फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की है कि दहेज हत्या से जुड़े विरले मामलों में ही दोषी को उम्रकैद की सजा सुनाई जानी चाहिए। । इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक की सत्र अदालत द्वारा दहेज हत्या के तहत पत्नी की मौत के लिए जिम्मेदार ठहराए गए व्यक्ति की उम्रकैद की सजा घटाकर दस साल कर दी। भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी (दहेज हत्या) के तहत सात साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है।

    जस्टिस पी. सतशिवम और एच.एल. दत्तू ने 'हेमचंद बनाम हरियाणा राज्य' मामले में तीन सदस्यीय पीठ के फैसले का जिक्र करते हुए कहा, 'धारा 304-बी के तहत कम से कम सात साल और अधिकतम उम्रकैद की सजा सुनाई जा सकती है। अधिकतम दंड (उम्रकैद) हर मामले में नहीं बल्कि विरले मामलों में ही दिया जाना चाहिए।'

    इस मामले में आरोपी जी.वी. सिद्धरमेश को कर्नाटक की एक सत्र अदालत ने पत्नी उषा की मौत का दोषी ठहराया था। सत्र अदालत के फैसले पर कर्नाटक हाई कोर्ट की मुहर लगने के बाद सिद्धरमेश ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। उषा और सिद्धरमेश की 13 दिसंबर 1997 को शादी हुई थी। शादी के एक महीने बाद ही उषा ने 17 जनवरी 1998 को अपनी ससुराल में फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली थी। दहेज में पचास हजार रुपये और लाने की सिद्धरमेश की मांग से आजिज आकर उषा ने यह कड़ा कदम उठाया।

    सिद्धरमेश ने दलील दी कि उषा इस शादी के खिलाफ थी। वह किसी और से प्रेम करती थी। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने उसकी यह दलील खारिज कर दी। अदालत ने कहा, 'मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर गौर करने के बाद हम इस बात से संतुष्ट हैं कि याचिकाकर्ता को धारा 304-बी के तहत दोषी ठहराए जाने का फैसला सही था। लेकिन, निचली अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा अधिक लगती है। चूंकि सिद्धरमेश युवा है इसलिए निचली अदालत द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा को कम करके दस साल करना उचित होगा।'

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  • कानून मंत्रालय ने ऐसे जजों की जानकारी मांगी जिनके बच्चे या रिश्तेदार उन्हीं की अदालत में वकालत कर रहे कानून मंत्रालय ने देश के सभी उच्च न्यायालयों में तैनात ऐसे जजों की जानकारी मांगी है जिनके बच्चे या करीबी रिश्तेदार उसी हाईकोर्ट में वकालत की प्रैक्टिस कर रहे हैं। कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने सभी हाईकोर्टो के मुख्य न्यायाधीशों को पत्र लिखकर ये जानकारी उपलब्ध कराने का आग्रह किया है। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में ही ऐसे 10 से ज्यादा जज हैं जिनके बच्चे या रिश्तेदार यहीं पर प्रैक्टिस कर रहे हैं।

    मंत्रालय की तरफ से जारी पत्र में कहा गया है कि वह हाईकोर्ट के ऐसे सभी न्यायाधीशों की जानकारी चाहता है जिनके करीबी रिश्तेदार व बच्चे उसी हाईकोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे हैं। कानून मंत्रालय का ये पत्र खास अहमियत रखता है क्योंकि हाल ही में विधि आयोग भी अपनी 230वीं रिपोर्ट में इस बात का जिक्र कर चुका है।

    दैनिक भास्कर में ललित कुमार की रिपोर्ट है कि विधि आयोग ने न्यायपालिका में पारदर्शिता लाने और व्यवस्था को ज्यादा सुचारु ढंग से चलाने के लिए उन लोगों को हाईकोर्ट जज न बनाने की सिफारिश की है जिनके बच्चे व करीबी रिश्तेदार उसी हाईकोर्ट में वकालत कर रहे हों।

    पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में ऐसे 10 से ज्यादा जज हैं जिनके बच्चे या रिश्तेदार यहीं पर प्रैक्टिस कर रहे हैं। हाईकोर्ट के वकील भी लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि जिन जजों के बच्चे व रिश्तेदार यहां वकालत कर रहे हैं, उनका तबादला किया जाए। 800 वकीलों ने इस संबंध में हस्ताक्षर कर एक प्रस्ताव भी बार एसोसिएशन के सामने रखा था। इसमें जजों के तबादले के अलावा उनकी संपत्ति की जानकारी हासिल किए जाने की मांग की गई थी।

    हाल में इसी मामले को लेकर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में किसी अज्ञात शख्स की ओर से तीन किस्तों में पत्र भी जारी किए गए थे। यह पत्र बार एसोसिएशन के सदस्य वकीलों और हाईकोर्ट के कार्यरत जजों को भेजे गए थे। इनमें सुप्रीम कोर्ट से रिटायर्ड जज और उनके वकील बेटे का जिक्र करते हुए संकेत दिया गया था कि कार्यरत जजों का वकालत कर रहे अपने बच्चों के साथ तालमेल की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

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  • पारिवारिक विवादों को हल करने के लिए दिल्ली में दो अतिरिक्त परिवार न्यायालय खोले जायेंगे अदालतों में लग रही भीड़ और लंबित पड़े वैवाहिक मामलों को देखते हुए तथा पारिवारिक विवादों को सौहार्दपूर्ण वातावरण में हल करने के लिए दिल्ली की रोहिणी अदालत में दो 'परिवार न्यायालय' का गठन किया जाएगा। फिलहाल दिल्ली में वैवाहिक मामलों से जुड़े 20,925 मामले लंबित हैं। अदालत के एक अधिकारी ने मीडिया को बताया है कि दोनों न्यायालय तैयार हैं और इस सप्ताह के अंत में इनका उद्घाटन किया जाएगा।

    उन्होंने बताया कि इस तरह की अदालतें खोलने का मुख्य उद्देश्य वैवाहिक मामलों को लेकर अदालत पहुंचने वाले दंपतियों के बच्चों को अनुकूल वातावरण मुहैया कराना है। इस तरह का एक 'परिवार न्यायालय' पहले ही द्वारका अदालत परिसर में चलाया जा रहा है। द्वारका अदालत में लोगों की अच्छी प्रतिक्रिया मिलने के बाद सभी जिला अदालतों में इस तरह की अदालत खोलने की योजना बनाई जा रही है।

    अधिकारी ने कहा, "शहर की अदालतों में पारिवारिक और वैवाहिक मामलों से जुड़े 20,925 मामले लंबित पड़े हुए हैं। इस तरह कम से कम 35 परिवार न्यायालयों की जरूरत है।"

    परिवार न्यायालय में पूरे समय के लिए एक मनोवैज्ञानिक रखा जाएगा जो उन दंपतियों को सलाह मशविरा देगा जिनका वैवाहिक जीवन प्रभावित है। इसके लिए दो कमरों का निर्माण किया जाएगा जहां मनोवैज्ञानिक दोनों पक्षों को सलाह देंगे।

    उल्लेखनीय है कि पारिवार न्यायालय अधिनियम, 1984 के लागू होने के बाद उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा, कर्नाटक, तामिलनाडु, केरल, बिहार और असम सहित अन्य राज्यों में 61 परिवार न्यायालय स्थापित किए गए हैं।

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  • राजस्थान में सभी वाहनों पर हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट लागू करना फिलहाल टला राजस्थान में सभी वाहनों पर हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट लागू करना फिलहाल टल गया है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और सरकार भी इस पर एक ही कंपनी का अधिकार समाप्त करने पर विचार कर रही है। सरकार ज्यादा कंपनियों को शामिल करने का विकल्प तलाश रही है, ताकि लागत कम आए। अभी इस पर 1250 रु. की लागत आ रही है। बाद में मात्र 250 रु. की लागत आएगी। दिल्ली में हाल ही में हुई ट्रांसपोर्ट डेवलपमेंट काउंसिल की बैठक में राज्य ने केंद्र के सामने अपना पक्ष रखा था। इसमें इस नंबर प्लेट पर राज्य के रुख और मौजूदा स्थिति पर चर्चा हुई। नंबर प्लेट बनाने वाली कंपनी ने शर्तो को पूरा नहीं किया जिसके चलते उसे यह काम नहीं दिया गया।

    सरकार ने भी स्पष्ट कर दिया है कि शर्तो को पूरा किए बिना कंपनी को काम नहीं दिया जा सकता। हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट अभी सिक्किम और मेघालय में ही अनिवार्य और गोवा में यह एच्छिक आधार पर लागू है। गोवा में विरोध के बाद सरकार ने इसे ऐच्छिक कर दिया।

    राजस्थान सहित अधिकतर राज्यों में नबंर प्लेट की कीमत को लेकर विरोध है। एक ही विदेशी कंपनी को काम दिए जाने से एक नंबर प्लेट की कीमत 1250 रुपए होती है, जिससे हर वाहनधारक पर 1000 रुपए का भार पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ज्यादा कंपनियों को इसमें शामिल करने से इस पर 250 रुपए से अधिक की लागत नहीं आएगी।

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  • विधि मंत्रालय के पास न तो सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किए गए जजों का रिकार्ड और न ही पदोन्नत्ति पर आपत्तियों का सूचना के अधिकार के तहत एक आवेदन पर अपने जवाब में विधि मंत्रालय ने साफ किया है कि उसके पास पदोन्नत हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का कोई रिकार्ड नहीं है। राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट के बीच पुल का काम करने वाले विधि मंत्रालय के पास तो सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किए गए जजों का कोई रिकार्ड है और ही उन जजों का जिनकी पदोन्नति पर आपत्तियां हुईं। सूचना के अधिकार के तहत एस सी अग्रवाल ने यह जानना चाहा था कि किन जजों ने अपनी संपत्तियों का खुलासा नहीं किया है और इसके बावजूद पदोन्नति पा गए। इसके साथ ही उन्होंने यह भी जानना चाहा था कि राष्ट्रपति की आपत्ति के बावजूद भी कितने जज पदोन्नत हुए।

    अग्रवाल के अनुसार उनके आवेदन का जवाब देते हुए मंत्रालय के सूचना अधिकारी एस के श्रीवास्तव ने बताया कि मंत्रालय के पास ऐसी कोई सूची नहीं है जिसमें उन जजों के नाम हों जिनकी पदोन्नति की फाइल राष्ट्रपति सचिवालय से वापस आई हो।

    दरअसल इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस चन्द्रमौलि कुमार को सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत करने वाली फाइल पर विपरीत टिप्पणी के बावजूद उनको पदोन्नत कर दिया गया था। दैनिक भास्कर में राकेश भटनागर की रिपोर्ट है कि शीर्ष अदालत के लिए पदोन्नत किए गए विभिन्न उच्च न्यायालयों के उन मुख्य न्यायाधीशों के बारे में भी विधि मंत्रालय के पास कोई जानकारी नहीं है जिनपर विभिन्न हलकों से आपत्तियां प्रकट की गई थीं।

    अग्रवाल ने राष्ट्रपति सचिवालय से शीर्ष अदालत और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों से जुड़े कई सवाल पूछे थे। राष्ट्रपति सचिवालय ने अग्रवाल की याचिका न्याय विभाग को स्थानांतरित कर दी थी।

    केंद्रीय सूचना आयोग ने हाल ही में उच्चतम न्यायालय को जजों की नियुक्ति और उनके पदोन्नति से जुड़े दस्तावेजों को सार्वजनिक करने का आदेश दिया था। हालांकि शीर्ष न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी थी।

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  • गोधरा दंगों के दौरान मुख्यमंत्री के तीन निजी सचिवों ने विश्व हिदू परिषद से संपर्क में रहने की बात कबूली गुजरात के वर्त्तमान मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यालय (सीएमओ) के तीन निजी सचिवों ने गोधरा कांड व उसके बाद भड़के दंगों की सुनवाई कर रहे नानावटी आयोग के समक्ष शपथपत्र में कबूल किया है कि दंगों के दौरान विश्व हिन्दू परिषद भारतीय जनता पार्टी के कई मंत्रियों पदाधिकारियों से टेलीफोन पर बात हुई थी। आयोग में पीडितों की ओर से पैरवी कर रही गैर सरकारी संस्था जन संघर्ष मंच (जे.एस.एम.) के वरिष्ठ वकील मुकुल सिन्हा ने बताया कि इस शपथपत्र में तीनों अधिकारियों ने दंगों के दौरान विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) के नेता जयदीप पटेल के साथ बातचीत की बात का हवाला दिया है। लेकिन बातचीत क्या हुई है इस संबंध में शपथपत्र में कुछ भी नहीं कहा गया है। मंच ने आयोग से मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित सात जनों को सम्मन जारी करने की गुहार लगाई थी।

    उधर मुख्यमंत्री मोदी सहित चार अन्य को सम्मन जारी किए जाने को लेकर गुजरात उच्च न्यायालय में मामला लंबित है। गत सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के महाधिवक्ता को यह निर्देश जारी किया था कि वे पता लगाएं कि मोदी व तीन अन्य जनों को नानावटी आयोग के समक्ष कब बुलाया जाएगा।

    उल्लेखनीय है कि 27 फरवरी 2002 को गोधरा कांड के बाद अहमदाबाद सहित कई जगहों पर सांप्रदायिक दंगे भड़के थे। दंगों की जांच के लिए राज्य सरकार की ओर से नानावटी आयोग का गठन किया था। आयोग ने गोधरा कांड को लेकर एक रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप दी है।

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  • गृह मंत्रालय ने राष्ट्रपति से 'गुजकोक' विधेयक पर हस्ताक्षर नहीं करने की सिफारिश की केंद्र ने राष्ट्रपति से गुजरात संगठित अपराध नियंत्रण विधेयक (गुजकोक) को मंजूरी नहीं देने का अनुरोध किया है क्योंकि इसमें सुझाए गए दो बदलावों को शामिल नहीं किया गया है। मीडिया की ख़बरों के अनुसार गृह मंत्रालय ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से विधेयक पर हस्ताक्षर नहीं करने की सिफारिश की है। गुजरात विधानसभा ने पिछले साल 28 जुलाई को चौथी बार विधेयक को पारित किया था। उन्होंने कहा कि गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने राष्ट्रपति से सिफारिश की है कि वे इसे मंजूरी नहीं दें क्योंकि इसमें अब भी वे दोनों प्रावधान मौजूद हैं, जिन पर केंद्र ने आपत्ति की थी।

    गृह मंत्रालय ने गुजकोक में दो प्रावधान हटाने को कहा था। दोनों प्रावधानों में किसी पुलिस अधिकारी के सामने अपराध स्वीकार किए जाने को अदालत में स्वीकार किया जाना तथा लोक अभियोजक के विरोध पर जमानत नहीं देने की बात शामिल है।

    गृह मंत्रालय की सलाह के बाद राष्ट्रपति ने नवंबर 2008 में गुजकोक विधेयक लौटा दिया था, लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार ने सुझाए गए बदलावों को स्वीकार नहीं किया और गुजरात के राज्यपाल ने विधेयक विचार के लिए राष्ट्रपति को भेज दिया।

    गुजरात सरकार की दलील है कि गुजकोक लगभग महाराष्ट्र के मकोका के समान है और केंद्र सरकार को उसे मंजूरी देनी चाहिए।

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  • दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सहित कई जज करोड़पति की श्रेणी में दिल्ली हाईकोर्ट के जजों द्वारा 5 फरवरी को अदालत की आधिकारिक वेबसाइट में किए गए संपत्ति के खुलासे से यह बात स्पष्ट हो गई है कि दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सहित कई जज करोड़पति की श्रेणी में आते हैं। उनके पास महंगे फ्लैटों के साथ ही लाखों के शेयर, म्यूचुअल फंड और अन्य योजनाओं में निवेश के रूप में संपत्ति मौजूद है। यही नहीं, उन्होंने अपने पैसों का बहुत अच्छा प्रबंधन भी किया हुआ है, विशेष कर रिहायशी और व्यवसायिक जमीनों में।

    वेबसाइट पर किए गए खुलासे के अनुसार, हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एपी शाह के पास मुंबई में एक फ्लैट, नरीमन प्वाइंट में एक कार्यालय और लाखों के आरईसी बांड हैं। इनके अलावा बचत और अन्य निवेश के रूप में करोड़ों की संपत्ति मौजूद है।

    वहीं जस्टिस संजय किशन कौल के पास अपने, पत्नी और बेटी के नाम से कश्मीर और दिल्ली में पुरखों से मिली संपत्ति और कई निजी फ्लैट, भवन, कृषि भूमि के साथ ही शेयरों, बांडों व अन्य योजनाओं में करोड़ों का निवेश मौजूद है।

    जस्टिस मदन बी लोकुर ने दिल्ली के वसंत कुंज और पुणो में घर होने के साथ ही लाखों का निवेश किया है।

    जस्टिस विक्रमजीत सेन की नई दिल्ली, डीएलएफ कुतुब एन्क्लेव, हरियाणा, इंदिरापुरम-गाजियाबाद, भोपाल में रिहायशी फ्लैट व प्लॉट में हिस्सेदारी के साथ ही डीएफएल टावर ओखला, नई दिल्ली के कमर्शियल फ्लैट में हिस्सेदारी है। इसके साथ ही बड़ी संख्या के शेयर और अन्य में निवेश के साथ ही साढ़े बारह लाख रुपए की बचत भी उनके पास मौजूद है।

    जस्टिस एके सीकरी के पास ग्रेटर नोएडा में सिंगल स्टोरी बिल्डिंग, गुड़गांव में रिहायशी फ्लैट, ईस्ट आफ कैलाश में प्रथम और द्वितीय फ्लोर पर रिहायशी फ्लैट के साथ ही डिफेंस कालोनी में एक भूतल व लाखों का निवेश मौजूद है।

    केरल और मद्रास के बाद दिल्ली हाईकोर्ट तीसरी हाई कोर्ट बन गई है, जिसके जजों ने अपनी संपत्ति का खुलासा किया है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के जजों ने पिछले साल अपनी वेबसाइट में जजों की संपत्ति का खुलासा किया था।

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  • पूर्व पुलिस महानिदेशक, पूर्व चुनाव आयुक्त सहित कई हस्तियों ने काला धन वापस लाने याचिका दी पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक जे.एफ. रिबेरो और पूर्व चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंगदोह सहित सोलह जानी-मानी हस्तियों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर विदेशी बैंकों में जमा काला धन वापस लाने का अनुरोध किया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को इसी मुद्दे पर पहले से लंबित वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी की याचिका के साथ संलग्न करने का निर्देश दिया है। मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली पीठ ने रिबेरो की वकील मीनाक्षी अरोड़ा की दलीलें सुनने के बाद ये निर्देश जारी किए।

    मीनाक्षी ने पहले से लंबित याचिका के साथ इसे संलग्न करने का अनुरोध करते हुए कहा कि सरकार को उन लोगों के नाम और दस्तावेजों का खुलासा करने का निर्देश दिया जाए जिन्होंने विदेशी बैंकों में पैसा जमा कर रखा है। पीठ ने जब उनसे पूछा कि उन्हें कैसे मालूम कि सरकार को पैसा जमा करने वालों के नाम मालूम हैं तो मीनाक्षी ने मीडिया में आई खबरों का हवाला देते हुए कहा कि सरकार ने विदेशी बैंकों से जानकारी मांगी थी और उसे कुछ जानकारी मिली भी है लेकिन सरकार इसका खुलासा नहीं कर रही।

    उन्होंने कहा कि कुछ देशों ने अपने यहां ऐसी कार्रवाई कर काले धन को वापस मंगा लिया है। पीठ ने उनकी दलीलें सुनने के बाद दोनों मामलों को एक साथ संलग्न करने का निर्देश दिया।

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  • उल्कापिंड पर अधिकार का मामला अदालत पहुँचा अमरीका में मालिकाना हक को लेकर जबर्दस्त विवाद हो गया है और यह मामला अब अदालत में पहुंच गया है। हुया यह कि गत 18 जनवरी को अमरीका के वर्जीनिया प्रांत में डा. मार्क गलिनी की क्लीनिक में उल्कापिंड का एक टुकड़ा आकर गिरा। डा. गलिनी ने कहा कि उल्कापिंड ठीक उसी जगह आकर गिरा जहां वह कुछ देर पहले बैठे हुए थे। डा. गलिनी और उनके एक सहयोगी ने यह टुकड़ा स्मिथसोनियन इंस्टीटच्यूट को देने के बारे में सोचा जिसके पास उल्कापिंड का सबसे बड़ा संग्रह है१ बाद में यह उल्कापिंड सुरक्षित रखने के लिए नेशनल म्यूजियम आफ नेचुरल हिस्ट्री को दे दिया गया।

    दोनों डाक्टरों को डर था कि इस पर उनके क्लिनिक के मालिक एरोल मुतलु को ऐतराज होगा। इसलिए उन्होंने उल्कापिंड स्मिथसोनियन इंस्टीटच्यूट को देने की बात मुतलु को बताई। डा.गलिनी के अनुसार मुतलु ने इस पर अपनी अनुमति दे दी, लेकिन बाद में उसका मन बदल गया। डा. गलिनी ने कहा कि मुतलु ने उन्हें एक ई.मेल भेजा जिसमें कहा गया कि मुतलु का भाई स्मिथसोनियन इंस्टीटच्यूट से उल्कापिंड वापस लेने जा रहा है। ई.मेल के अनुसार अमरीकी अदालतों ने यह फैसला दिया है कि उल्कापिंड जिस भूमि पर आकर गिरेगा उस पर उस जमीन के मालिक का अधिकार होगा। डा. गलिनी ने कहा कि बाद में मुतलु अपनी इस बात से पलट गया और कहा कि उल्कापिंड स्मिथसोनियन में ही रहेगा।

    मुतलु के वकील ने फिलहाल इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है। डा. गलिनी और उनके सहयोगी ने भी अपनी तरफ से वकील नियुक्त किया है जिसने स्मिथसोनियन से अपील की है कि वह उल्कापिंड को तब तक अपने पास सुरक्षित रखे जब तक उसके मालिक का निर्णय नहीं हो जाता।

    स्मिथसोनियन इंस्टीटच्यूट ने उल्का¨पड के मालिकाना अधिकार पर कोई भी टिप्पणी नहीं की है। उसने अपने बयान में कहा कि जब तक इसके मालिक का फेसला नहीं हो जाता तब तक यह उसके पास ही रहेगा। उल्कापिंड को लेकर कानूनी विवाद कोई नई बात नहीं है। इससे पहले 1990 की शुरुआत में 15 टन के उल्कापिंड पर मालिकाना अधिकार का मुकदमा ओरेगों सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया था। तब अदालत ने फैसला दिया कि इस पर जमीन के मालिक का अधिकार है। गलिनी और उसके सहयोगी के वकील ने कहा है कि वर्जीनिया का कानून ओरेगों से अलग है इसलिए उल्कापिंड पर अधिकार का फैसला भी अलग तरह से होगा।

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  • मराठी, गैर मराठी के नाम पर 'राजनीतिक गुंडागर्दी' के संबंध में बांबे हाई कोर्ट द्वारा राज्य सरकार से जवाब तलब महाराष्ट्र में मराठी और गैर मराठी के नाम पर हो रही 'राजनीतिक गुंडागर्दी' के संबंध में बांबे हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि क्या विगत कुछ समय में राज्य में हुई राजनीतिक गुंडागर्दी में शिवसेना, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) और कांग्रेस के नेताओं के शामिल होने संबंधी कोई सुबूत सरकार ने जुटाए हैं? क्या बाल ठाकरे, उद्धव ठाकरे, राज ठाकरे, नारायण राणे के खिलाफ कोई मामला दायर किया है या कोई कार्रवाई की गई है? न्यायमूर्ति जे.एन. पटेल और न्यायमूर्ति बी.आर. गवई की पीठ ने राज्य के अतिरिक्त गृह सचिव को इन सवालों के जवाब देने के लिए दो हफ्ते दिए हैं।

    अदालत ने पूर्व आईपीएस अधिकारी जे. रेबेरियो की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान ये सवाल किए और जवाब मांगा। जूलियो ने अपनी याचिका में वर्ष 2008 में इन पार्टियों द्वारा राज्य के विभिन्न इलाकों में गुंडागर्दी के आरोप लगाए हैं।

    याचिका में मनसे कार्यकर्ताओं द्वारा मुंबई यूनिवर्सिटी पर हमला, शिवसेना कार्यकर्ता द्वारा होटल इंटरकांटीनेंटल पर हमला, कांग्रेसी नेता नारायण राणे के समर्थकों द्वारा समाचार पत्र 'नवकाल' के दफ्तर पर हमला सहित मुंबई और ठाणे के विभिन्न इलाकों में हुए हमलों का उल्लेख किया गया है। याचिका में कहा गया है, 'राजनीतिक दलों की वजह से निजी संपत्तियों को खासा नुकसान हुआ है। सरकार को इन दलों से नुकसान की भरपाई करनी चाहिए।'

    याचिकाकर्ता ने इन मामलों में बाल ठाकरे सहित सभी दोषी नेताओं के खिलाफ मामला चलाने की मांग की है। इससे पहले सरकारी वकील निरंजन पंडित ने कोर्ट से कहा, 'नवकाल समाचार पत्र के अलावा जिन तीन मामलों का जिक्र है, उनमें सरकार ने नुकसान का मुआवजा वसूला है। इसके साथ ही दोषी नेताओं के खिलाफ मामले भी दर्ज किए गए हैं।'

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